Tuesday, February 6, 2024

सरयू तट पर बैठकी लगी है।

        अंगद, सुग्रीव, नल, नील, जामवंत के साथ विभीषण और निषादराज आपस में बातचीत कर रहे हैं। सभी लोग हनुमान जी के अतिथि हैं, पिछले पांच सौ बरस से वे अयोध्या जब भी आते हैं हनुमान जी के यहाँ ही रुकते हैं।

रामकथा कहते सुनते आज का दिन बीता है, सांझ होने को आई, अयोध्या की सुन्दरता, लोगों में भगवतभक्ति देखकर सभी के मन आह्लादित हैं, तभी हनुमानगढ़ी से बजरंगी आते दिखे, एक हाथ में दोना लिए दूसरे हाथ को पेट पर सहलाते चले आ रहे हैं।

हनुमान जी कितने भागवान हैं जो इनके लिए अपने निकट घर बनवा दिया था भगवान ने, नल बोले।

वह तो है, देखो दोने में क्या ला रहे हैं महावीर? आजकल तो रोज नया नया व्यंजन खाने को मिल रहा है, अंगद का ध्यान खाने पर था।

सुगंध तो बड़ी अच्छी आ रही है, कल हलवा लाये थे, उससे पहले जाने क्या लाये थे जिसमें तीन कान बने हुए थे, सुग्रीव नाक ऊँची करते हुए बोले।

उसे समोसा कहते हैं, वानरराज, मुझे यह व्यंजन बहुत पसंद आया था, मैंने बजरंगी से बाद में और मंगा कर खाया था, आज लगता है कुछ मीठी वस्तु ला रहे हैं आंजनेय, विभीषण ने कहा।

हनुमान जी ने पास आकर दोना चट्टान पर रख दिया, सफ़ेद सी गाढ़ी मलाई जैसी कोई वस्तु थी।

युवराज जी इसे पहले आप चखिए, आज कोई भक्त चढ़ा गया था। मुझे यह पसंद आया तो आप लोगों के लिए ले आया, बजरंगी बैठते हुए बोले।

यह तो बहुत स्वादिष्ट है, क्या नाम है इसका?
अंगद ने मिष्ठान्न का स्वाद लिया और फिर सभी में बांटने लगे।

इसका नाम कलाकंद है युवराज, यह मिष्ठान्न भगवान विश्वनाथ को भी बहुत प्रिय है, तभी रुद्रावतार को भी यह पसंद आया, निषादराज गुह कलाकंद खाते हुए बोले।

कुछ भी कहो जब से बजरंगी के यहाँ आये हैं तब से आनंद ही आनंद हो रहा है। भगवान का इतना भव्य महल बनकर तैयार हो गया, आज भगवान उसमें विराज गये, हमारी प्रतीक्षा पूर्ण हो गई, जामवंत आनंदित होकर बोले।

आज प्रभु का दर्शन हो गया, सोचकर आंसू भर आते हैं, त्रेता में एक मेरा भाई ही दुष्ट था पर इस कलयुग में कितने दुष्ट थे लेकिन प्रभु ने मर्यादा नहीं त्यागी, चाहते तो सबको भृकुटी विलास मात्र से सीधा कर देते या हममें से किसी को भी आज्ञा दे देते, पर उन्होंने इस काज हेतु नरों में एक श्रेष्ठ नर को चुना और उसकी सहायता के लिए भोलेनाथ का एक आदित्य नामक गण भेज दिया और आज के विधि विधान से ही अपने महल में विराजे, विभीषण पुनः बोले।

हनुमान जी सारा रहस्य जानते हैं, कलाकंद खाते हुए मुस्कुराते रहे, फिर बोले, राम जी की माया वही जानें, हम तो सेवक हैं लंकापति जी, चलो देखो देवता लोग भी आ गये हैं, अब भेस बदलो, सरयू मइया की आरती का समय हो गया है।

सब लोगों ने कलाकंद ख़त्म किया और भेस बदलकर आरती में शामिल होने चले गये।

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